Sunday, February 24, 2013

दिल्ली दमन दामिनी

नन्हें-नन्हें कदमों से चलते
छोटे-छोटे मासूम ख्वाब
आते हैं दिल वालों(?) की दिल्ली में
पूरे हिंदुस्तान से
इस बार आया था
बलिया के किसी गाँव से

ख्वाबों की दिल्ली
ख्वाब .......................
अपनी एक पहचान और पता ढूंढने
अक्षर के धाम में कुछ मांगने
क़ुतुब मीनार को छूकर देखने
संसद की दीर्घा में बैठने
और इंडिया गेट पर शहीदों को याद करने
जिन्होंने अपना आज दिया
हमारे बेहतर कल के लिए

अक्सर टूट जाते हैं कभी काले शीशे वाली बसों में
बड़ी सी मोटरकार की पिछली सीट पर
कालेज के कैम्पस में
और कोलतार से काली चिकनी सडकों पर
लाल पीली हरी बत्तियों की
आँखों के सामने
तब किसी दामिनी के ख्वाब सवाल करते हैं
पूरे हिंदुस्तान से
गुस्से और हताशा से बंधी मुट्ठियों में
हजारों-हज़ार
मोम बत्तियां थामे
क्या कोई सुनेगा?
क्या कोई सुनेगा?
क्या कोई सुनेगा?

Sunday, November 11, 2012

अमराई



अमराई में अब तो अम्बियां दीखने लगी होंगी मुझे तुम याद आये कोलाज़ की तरह बेतरतीब स्मृतियां-

अम्बियों और कैरियों के पीछे मेरी दीवानगी और तुम्हारे गुलेल के निशाने की परीक्षा। मैंने पूछा मैं जो अम्बियां कहूं तुम गुलेल से तोड़ दोगे, तुमने ये नहीं कहा ये तो मेरे बाएं हाथ का काम है (फिल्म शोले की तरह) गाँव की गलियों में घूमती किसी पागल लड़की की तरह चलती, जेठ के तप्त झोंकों से लहराते मेरे सूखे बालों के बीच छिपते-निकलते चेहरे की तरफ देखकर तुमने पूछ ही लिया, तुम्हें क्या पसंद है। कैरियां, टिकोरे या सुग्गों के जूठे किये मीठे आम (शबरी के बेरो की तरह) मैं तो आज तक तय नहीं कर पाई अम्बियां, कैरियां या टिकोरे।

तुमने वादा किया आने का इस शर्त के साथ कि गुलेल के लिए गोल-गोल पत्थर मैं चुन कर लाऊं, छोटी पहाड़ी से निकले बरसाती नाले की रेत से चुनकर, मैं पूरी दोपहर चुनती रही गोल चिकने पत्थर, जलती रेत में नंगे पांव, जूतियाँ नहीं पहनी, मां पूछती इतनी दोपहर में कहा? तो पकड़ी जाती। पावों के छालों के साथ, भर ली फ्राक की दोनों जेबें, अब कहूँगी तोड़ो अम्बियां इन कंकरों से, जब तक खाली जेबें न भर जायें कसैली खट्टी कैरियों से और हां मुट्ठी में छुपाकर एक चुटकी नमक साथ लाई, कैरियों के साथ तुम्हें परोसने के लिए, गिनती रही उंगलियों के इशारे से अम्बियां, जब आओगे उंगलियों से दिखाकर कहूंगी वो वाली, नहीं उसके साथ वाली, इस तरह तुम्हें परेशान कर दूंगी, तुमने भी तो यही किया, अब तक मैं गिनती रही कैरियां, सुनती रही कोयल की बेसब्र कूक और देखती रही हारिलों का फुदकना, सुग्गों की लाल, चोंच हरी कैरियों के बीच।

तुम नहीं आये।

सूरज आ गया उस कोने के सबसे घनेरे आम की फुनगी से नीचे, तुम नहीं आये। उकता कर मैं चली आई, घाट पर फेंकने लगी सारे गोल कंकर, जतन से सहेजे हुए, तुम्हारी गुलेल के लिए जो भरे थे फ्राक की जेबों में कल से। हर कंकर से कांप जाती पानी की सतह और थरथराती लहरें,जैसे मेरे मन में उठ रही हो, ऊभ-चूभ होती मेरी उम्मीदों की तरह, पर तुम नहीं आए, मुट्ठी में बंद नमक पसीज कर फैलने लगा। आखिरी कंकर फेंककर धो ली मैंने हथेलियां और देर तक देखती रही, अपने को पहचानने की कोशिश में फैलती लहरों के साथ, धुंधलाता अपना ही अक्स, तब से मैंने अम्बियां खाई ही नहीं अब तक, यह जानकर कि उस पूरी दोपहर तुम बावरे से भागते रहे बोहार बन में फाख्ताओं के पीछे। जब तक अमराई में चिमगादड़ उलटे नहीं लटकने लगे। 

आम की घनी और ठंढी छांव में बिताई दुपहरिया में न जाने कितनी बातें सीखीं तुमसे, सूखे पत्तों के बीच सरसराकर निकलते बड़े से सांप से डर कर तुम्हारी ओर भागी तो तुम्हीं ने बताया पगली ये तो असढि़या है, आषाढ़ का सांप है जिसका जहर सिर्फ आषाढ़ में मारक होता है और देखो इस साल दो आषाढ़ हैं, पुरुषोत्तम मास और यह भी कि शास्त्रों में कहा गया है- मिट्ठू और गिलहरियों के काटने से फल और बछड़े के पीने से दूध कभी जूठा नहीं होता, सर्प और फल के ये गुण जानती तो तुम्हारी ओर डर से नहीं भागती, आदम-ईव की कहानी तो बाद में पढ़ी, काश ये जान लेती उस दुपहरिया में ईडन के बाग, सांप और निषिद्ध फल का पुराण और तुम्हें भी, मैं तो जान ही नहीं पाई, प्रकृति विज्ञान और शास्त्रों के ज्ञाता तुम, मेरे भी मन को क्यों नहीं पढ़ पाए या जान-बूझकर अजाने बने रहे  मैं तो आज तक ये समझ ही नहीं पाई उस दिन की बीती दुपहरिया जैसे कितने साल बीत गए, अब आसपास ना अमराई है, न तालाब, न बरसाती नाला, खिड़की से दिखने वाला भी आसमान धुआं-धुआं हो चला है और मैं तो अब तक भी तय ही नहीं कर पाई, अम्बियां, कैरियां या टिकोरे/कोयल, हारिल या चिमगादड़ या फाख्ते, कौन है जो मुझे खींच लेता है बार-बार अमराई में।

अब तो आ ही गई होंगी अम्बियां अमराई में।

Friday, October 12, 2012

विक्रमार्क, चुनाव, वेताल

आ गए चुनाव
वेताल को पेड़ पर लटका छोड़
चल दिया विक्रमार्क
बैनर और पोस्टर टांगने
समदर्शी होकर
क्या फर्क पड़ता है
अगर कहीं पंजा कमल को दबोचता है
कही हाथी दोनों को कुचलता है
हाथी पे भारी है
सायकिल की सवारी
हंसिया काटता है
जरखेज जमीनों की बीमार फसल
और हथौड़ा अन्धों की तरह सबको कूटता है
लालटेन, किरासन की कतार में खड़े-खड़े बुझ रही है
ग्रास रूट की हरी-भरी फसल को बाड़ खुद चर रही है
राष्ट्रवादी पार्टी क्रिकेट के मैदान पर खड़ी
कभी बाउंसर कभी गुगली फ़ेंक रही है
नई-नई पतंगें परवान चढ़ रही हैं
अन्ना की टोपी उतर रही है
आम आदमी (?) के सिर चढ़ रही है
क्या करे विक्रमार्क
सिर्फ कहानियों से घर थोड़ी चलता है
तलवार किराने दुकान में गिरवी पड़ी है
वेताल की कथाएं
अब अप्रासंगिक हो चली हैं
पर अब भी इंतज़ार कर रहा है
विक्रमार्क का