Friday, October 12, 2012

विक्रमार्क, चुनाव, वेताल

आ गए चुनाव
वेताल को पेड़ पर लटका छोड़
चल दिया विक्रमार्क
बैनर और पोस्टर टांगने
समदर्शी होकर
क्या फर्क पड़ता है
अगर कहीं पंजा कमल को दबोचता है
कही हाथी दोनों को कुचलता है
हाथी पे भारी है
सायकिल की सवारी
हंसिया काटता है
जरखेज जमीनों की बीमार फसल
और हथौड़ा अन्धों की तरह सबको कूटता है
लालटेन, किरासन की कतार में खड़े-खड़े बुझ रही है
ग्रास रूट की हरी-भरी फसल को बाड़ खुद चर रही है
राष्ट्रवादी पार्टी क्रिकेट के मैदान पर खड़ी
कभी बाउंसर कभी गुगली फ़ेंक रही है
नई-नई पतंगें परवान चढ़ रही हैं
अन्ना की टोपी उतर रही है
आम आदमी (?) के सिर चढ़ रही है
क्या करे विक्रमार्क
सिर्फ कहानियों से घर थोड़ी चलता है
तलवार किराने दुकान में गिरवी पड़ी है
वेताल की कथाएं
अब अप्रासंगिक हो चली हैं
पर अब भी इंतज़ार कर रहा है
विक्रमार्क का

Thursday, September 27, 2012

परिंदे ऐसे आते हैं


आज सुबह जब आंख खुली

रात की आलस धुली
मैंने पाया
मैं चिड़िया बन गया हूँ
तोता, मैना, कलहंस
या बुलबुल
या उकाब
नहीं जनाब
महज एक कठफोड़वा
सोचा घूम आऊं ब्रश करके
लेकिन वहां तो थे ही नहीं दांत
ठकठकाने लगा एक शाख
चोंच साफ हो न हो छेद कर पाने पर
जम तो जाएगी धाक
किस्मत की बात है
मिल जाएँ कीड़े और इल्लियाँ
छाल की दरार में मकड़ियाँ
नाश्ता तो जरुरी है
छूट गए हाथ और दांत
पर डैनों और पंजों के साथ भी
यही दुःख है
साथ तो है ही पेट
और पेट के साथ
भूख है

Thursday, September 6, 2012

तितलियाँ :मरी हुई

तार के स्टैंड से
छिदी-बिंधी
रसीदें और रुक्के
इनके बीच भिंचा
तुम्हारी यादों के हिसाब का
गुलाबी पन्ना
जिसका सिर्फ एक कोना
बाहर झांक रहा है
देने - पाने के पुर्जे
बढ़ते-बढ़ते
छत से लटके
बल्ब के ठीक नीचे तक जा पहुँचे हैं
जहाँ रोज रात एक दुमकटी छिपकली
तितलियों
और
जुगनुओं का
शिकार किया करती है

मई 1976 की किसी रात